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अफसरों की मेहरबानी या मलाई का खेल? 2024-25 के बाद ‘गायब’ हुआ प्लेसमेंट टेंडर, दो साल से चहेती एजेंसी की चांदी

बालोद। नगर पालिका परिषद बालोद में नियम-कायदों को ताक पर रखकर किस तरह चहेती एजेंसियों को फायदा पहुंचाया जाता है, इसका बड़ा उदाहरण इन दिनों “प्लेसमेंट टेंडर” को लेकर सामने आ रहा है। मामला मैनपावर सप्लाई से जुड़े उस टेंडर का है, जिसकी अवधि वित्तीय वर्ष 2024-25 में ही समाप्त हो चुकी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज 2026-27 का वित्तीय वर्ष शुरू होने के बाद भी नया टेंडर जारी नहीं किया गया है।
सूत्रों के अनुसार, पालिका में कर्मचारियों की आपूर्ति करने वाली एजेंसी को लगातार फायदा पहुंचाया जा रहा है। नियमानुसार टेंडर अवधि समाप्त होने के बाद नई निविदा प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए थी, ताकि अन्य एजेंसियों को भी प्रतिस्पर्धा का अवसर मिल सके और नगर पालिका को पारदर्शी प्रक्रिया के तहत बेहतर दरों पर सेवाएं मिल सकें। लेकिन यहां तो पूरा मामला ही “विशेष कृपा” का दिखाई दे रहा है।
सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि आखिर दो वर्षों तक नया टेंडर जारी क्यों नहीं किया गया? क्या जिम्मेदार अधिकारियों को नियमों की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर फाइलों को दबाकर रखा गया है? पालिका के गलियारों में चर्चा है कि बिना ओपन टेंडर के लगातार एक्सटेंशन देना सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में भी आ सकता है।
नगर पालिका के CMO और संबंधित अधिकारियों की चुप्पी भी कई सवाल खड़े कर रही है। आखिर ऐसी कौन-सी मजबूरी है कि नई निविदा प्रक्रिया शुरू नहीं की जा रही? क्या यह सिर्फ सुस्ती का मामला है या फिर इसके पीछे “मलाई” का कोई बड़ा खेल चल रहा है?
जानकारों का कहना है कि शासन के नियमों के अनुसार किसी भी सेवा प्रदाता एजेंसी को लंबे समय तक बिना नई निविदा प्रक्रिया के बनाए रखना पारदर्शिता पर सवाल खड़े करता है। इससे प्रतिस्पर्धा खत्म होती है और भ्रष्टाचार की आशंका बढ़ जाती है।
ऑडिट टीम और UADD की भूमिका पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में ऑडिट टीम और नगरीय प्रशासन विभाग की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं। लोगों का कहना है कि यदि टेंडर अवधि समाप्त हो चुकी थी, तो विभागीय जांच या आपत्ति अब तक क्यों नहीं हुई? क्या जिम्मेदार विभागों को इस पूरे मामले की जानकारी नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?

