छत्तीसगढ़बालोद

लगता है बालोद पालिका और जन कल्याण का कोई संबंध नहीं

डीएमएफ के 65 फीट ऊंचे हाई-मास्ट पोल के नीचे छिपा बड़ा खेल: फाइलों में 100 बोरी सीमेंट का फौलादी पहाड़, जमीन पर लीपापोती

बालोद। जनता के हक और खनिज प्रभावित क्षेत्रों के विकास के लिए मिले जिला खनिज न्यास निधि के पैसों पर ठेकेदारों और जिम्मेदार अफसरों की मिलीभगत का ऐसा ग्रहण लगा है कि सुरक्षा के सारे तकनीकी नियम ताक पर रख दिए गए हैं। नगर पालिका परिषद बालोद में 20 मीटर (करीब 65 फीट) ऊंचे हाई-मास्ट पोल की स्थापना के नाम पर फाइलों में जो फौलादी किलेबंदी दिखाई गई है, धरातल पर उसकी कलई खुल चुकी है। जमीन में दबी नींव को देखकर साफ हो गया है कि जनता की सुरक्षा भगवान भरोसे छोड़ दी गई है और कागजों में बड़े पैमाने पर कांक्रीट का खेल खेला जा चुका है।

फाइलों में चट्टान, धरातल पर खोखला खूंटा;

तकनीकी प्राक्कलन और कार्यपालन अभियंता द्वारा जारी तकनीकी स्वीकृतियों के अनुसार, आंधी-तूफान के 180 किमी प्रति घंटे की रफ्तार वाले थपेड़ों को सहने के लिए 2 मीटर लंबा, 2 मीटर चौड़ा और सवा आठ फीट (2.50 मीटर) गहरा कंक्रीट बेस बनना था। गणित के हिसाब से यह पूरा 10 घन मीटर का ठोस स्ट्रक्चर होता है—यानी करीब 100 बोरी सीमेंट और दो बड़े कंक्रीट मिक्सर ट्रकों का माल अकेले एक गड्ढे में समाना था, जिसके लिए 52 हजार प्रति फाउंडेशन की दर से सरकारी खजाने से भुगतान तय है। लेकिन मौके की तस्वीर चीख-चीखकर गवाही दे रही है कि यहां 10 घन मीटर का नामोनिशान नहीं है। ऊपर से महज तीन फीट का दिखने वाला यह पेडस्टल और आसपास का उथला गड्ढा बता रहा है कि कंक्रीट की भारी मात्रा धरातल पर उतारी ही नहीं गई। सवाल यह उठता है कि अगर नींव ही इतनी उथली और कमजोर है, तो क्या यह कल किसी बड़े हादसे का सबब नहीं बनेगी?

पाइप तक हजम, उखड़े किनारों से फूटा घटिया निर्माण का भांडा;

­

लापरवाही की हद यहीं खत्म नहीं होती। सरकारी एस्टीमेट की कंडिका 1 में साफ लिखा था कि कंक्रीट ढालते वक्त ही 50 एमएम के 2 नग पीवीसी केबल कंड्यूट पाइप अंदर दबाए जाएंगे, ताकि जमीन के नीचे से आने वाला मुख्य बिजली का तार सुरक्षित खंभे के भीतर पहुंच सके। लेकिन मौके पर बने कंक्रीट ब्लॉक के ऊपर ऐसा कोई पाइप बाहर निकला हुआ नहीं है। यानी अब तार ले जाने के लिए या तो इस नए कंक्रीट पर हथौड़े चलेंगे जिससे नींव कमजोर होगी, या फिर नंगा तार बाहर से खींचा जाएगा जो खुलेआम करंट का खतरा बनेगा।
इतना ही नहीं, शटरिंग हटाते ही कंक्रीट के किनारे भरभराकर उखड़ गए हैं और अंदरूनी हनीकॉम्बिंग साफ झांक रही है। इससे साबित होता है कि कामचलाऊ तरीके से बिना वाइब्रेटर चलाए गिट्टी-सीमेंट उड़ेल दिया गया, जिससे अंदरूनी सरिए का कवर ही खत्म हो गया।

उखड़े किनारे वैसे ही छोड़े, नीचे उड़ेल दिया कंक्रीट;

​फाउंडेशन के किनारे कंक्रीट का हनीकॉम्बिंग साफ दिखाई दे रहा है। कायदे से इसे ठीक किया जाना था और केबल के लिए नदारद 50 मिमी पीवीसी कंड्यूट पाइप का हल निकाला जाना था। लेकिन इन गंभीर कमियों को दरकिनार करते हुए, आनन-फानन में खुले गड्ढे के भीतर कंक्रीट डाला जा रहा है। मौके पर मौजूद जानकारों का कहना है कि यह कंक्रीट फाउंडेशन की मजबूती बढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि जमीन की असल गहराई और नीचे की अनियमितताओं को हमेशा के लिए दफन करने की नीयत से डाला जा रहा है।

कॉपी-पेस्ट एस्टीमेट और बंदरबांट का अंदेशा;

हैरानी की बात यह है कि गंगा तालाब परिसर, बुधवारी बाजार और बस स्टैंड तीनों जगहों के लिए एक ही तारीख में तकरीबन 6 लाख रुपये के हूबहू एक जैसे एस्टीमेट पास कर दिए गए। हर जगह 100 मीटर केबल और 90 मीटर पाइप की एक समान मात्रा बिना किसी वास्तविक साइट सर्वे के आंख मूंदकर कागजों पर दौड़ा दी गई। डीएमएफ मद की गाढ़ी कमाई से जगमगाहट के नाम पर जनता के सिर पर 65 फीट का मौत का खंभा खड़ा करने की तैयारी है। अब देखना यह है कि फाइलों पर आंख मूंदकर दस्तखत करने वाले अधिकारी खुद मौके पर कंक्रीट की गहराई व गुणवत्ता नापते हैं, या फिर ठेकेदार की इस खुली मनमानी को हरी झंडी देकर बिल पास कर दिया जाएगा।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!