
हर जरूरत में काम आने वाला मैं वही सरदार पटेल मैदान हूं..
याद करो, जब शहर में कोई बड़ा राष्ट्रीय पर्व मनाना होता है, तो मेरा ही सीना तिरंगे की शान से चौड़ा होता है। जब किसी राजनीतिक दल को अपनी ताकत दिखानी होती है और भीड़ जुटानी होती है, तब मेरी ही गोद में कुर्सियां और मंच सजते हैं।
जब शहर में कोई मेला, प्रदर्शनी या उत्सव आता है, तो मैं चुपचाप सबकी खुशियों का बोझ अपने कंधों पर उठा लेता हूं। हर सुबह जब सूरज की पहली किरण फूटती है, तो इस माटी के नौजवान, धावक और भविष्य के सैनिक अपनी सांसें और पसीना मुझ पर न्योछावर करते हैं।
मैं शहर की हर खुशी, हर ज़रूरत और हर संघर्ष का सबसे वफादार गवाह रहा हूं। आज जब मुझे देखा गया, तो मेरी छाती पर चूने की सफेद लकीरें खिंची हुई थीं। यह कोई खेल की सीमा नहीं थी, बल्कि मुझे लोहे के एक तंग पिंजरे में कैद करने का फरमान था।
मेरी इस सिसकती माटी की कहानी यहीं खत्म नहीं होती, फाइलों की कालिख अभी और भी गहरी है, आगे है..अधीक्षण अभियंता की मुहर सिर्फ नॉन-एसओआर सामानों पर और टेंडर 28.74 लाख का



