
मैं सरदार पटेल मैदान हूं… जरूरत में काम आने वाला तुम्हारा अपना मैदान
हां, मैं वही सरदार पटेल मैदान हूं, जिसने इस शहर के हर सुख-दुख, हर संघर्ष और हर उत्सव को अपनी खुली छाती पर समेटा है।
जब भी इस शहर को सांस लेने की जगह चाहिए थी, जब भी युवाओं को अपने सपनों की दौड़ पूरी करनी थी, जब भी शहर की रैलियों, जनसभाओं और राष्ट्रीय पर्वों के लिए एक खुली जगह की दरकार हुई—मैं हमेशा बाहें फैलाए खड़ा रहा।
सुबह के घने कोहरे में जब कोई गरीब या मध्यमवर्गीय बेटा पुलिस या सेना की भर्ती के लिए पसीना बहाने आता है, तो मैं ही अपनी समतल माटी पर उसके पैरों को कभी फिसलने नहीं देता।
जब कोई बच्चा हाथ में बैट और गेंद लेकर अपना भविष्य तलाशता है, तो मैं बिना किसी फीस और बिना किसी पाबंदी के उसे अपनी गोद में खेलने देता हूं। लेकिन आज, जब मुझे सबसे ज्यादा इस शहर के साथ की जरूरत है, तब मेरे ही सीने पर फाइलों की साजिशें रची जा रही हैं।
अगर आज तुमने मेरी सांसों की रक्षा नहीं की, तो कल तुम्हारे बच्चों के पास दौड़ने के लिए केवल चारदीवारी और बंद पिंजरे ही बचेंगे। मत भूलिए—मैं वही जरूरत में काम आने वाला सरदार पटेल मैदान हूं।

