
अब खामोश क्यों है सीएमओ की टेबल?
नगर पालिका प्रशासन की प्रशासनिक धुरी CMO होते हैं। टेंडर प्रक्रिया, वर्क ऑर्डर, तकनीकी स्वीकृति और भुगतान से जुड़ी हर फाइल इसी दफ्तर से होकर गुजरती है।
जब माननीय अध्यक्ष खुद कह रही हैं कि उन्हें टेंडर, एजेंसी और नियमों की कोई जानकारी नहीं दी गई, तो प्रशासनिक नैतिकता का तकाजा यही कहता है कि CMO तत्काल प्रभाव से इस पूरे मामले की फाइलें तलब करें।
क्या CMO में यह प्रशासनिक साहस है कि वे गंगासागर तालाब के नाम पर स्वीकृत DMF मद की पूरी नस्ती (फाइल) निकालकर जांच के लिए जिला खनिज न्यास के अध्यक्ष यानी कलेक्टर के पास भेजें?
अगर प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी थी, तो फिर फाइलों को सार्वजनिक करने और उच्च स्तरीय जांच की अनुशंसा करने में हिचकिचाहट क्यों?
जिला खनिज न्यास निधि का गठन विकास और जनसुविधाओं के लिए किया गया है, न कि अफसरों और चहेते ठेकेदारों की मिलीभगत से फिजूलखर्ची करने के लिए।
खरीदी गई नई बोट आज तक पानी में उतरने का इंतजार कर रही है। दस वर्षों में विसर्जन कुंड, गहरीकरण, बाउंड्रीवॉल और बोर खनन के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खपा दिए गए, लेकिन नतीजा सिफर है।


