
अरे ओ सांभा! कितने का था वो डायलिसिस प्लांट?… पूरे दो लाख चालीस हजार का, सरकार
रामगढ़ के बीहड़ों में गब्बर सिंह ने भी लूट के ऐसे दांव-पेंच नहीं सीखे होंगे, जैसे BALOD नगर पालिका के दफ्तर में आजमाए गए हैं।
यहां का मंजर देखकर तो ठाकुर साहब भी अपने कटे हाथ माथे पर मार लें और बसंती तांगा मोड़कर उल्टे पांव भाग खड़ी हो। मामला ही ऐसा है—नाली-सड़क की झाड़ू लगाने वाली नगर पालिका में सीधे अस्पताल का किडनी हेमोडायलिसिस प्लांट उतर आया है।
अफसरों ने सोचा था कि डिब्बे पर हेमोडायलिसिस का सरकारी तमगा लगा रहेगा और अंधेरगर्दी की यह दास्तान फाइलों में दफन हो जाएगी। लेकिन जब जय और वीरू ने डिब्बे की सील तोड़ी, तो अंदर का सच देखकर गब्बर के डाकू कोमा में है।
डिब्बे के अंदर से न कोई अस्पताल की मशीन निकली, न कोई डायलिसिस प्लांट। अंदर बैठा था—रसोई की खूंटी पर टंगने वाला मात्र 10 लीटर का साधारण ब्राइट एक्वा घरेलू वाटर फिल्टर।
सब-इंजीनियर, बाबू और सप्लायर की तिगड़ी की सिट्टी-पिट्टी गुम है। देखना यह है कि कानून की अदालत इन किडनी के सौदागरों पर क्या कार्रवाही करती है, या फिर फाइलों में डायलिसिस का यह शोले यूं ही चलता रहेगा।


