
तीसरी आंख को लगा मोतियाबिंद: पालिका के हाई-टेक कैमरे केवल कबूतरों के आराम फरमाने के काम आ रहे!
शहर की सुरक्षा के लिए नगर पालिका द्वारा लगाई गई तीसरी आंख ने उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद दुनियादारी से संन्यास ले लिया है। जनता सोच रही थी कि अब अपराधी खौफ में रहेंगे, लेकिन असल में कैमरे खुद ही अंधकार में चले गए हैं।
पालिका कार्यालय की बड़ी स्क्रीन पर स्टेडियम और बाजार की हलचल देखने का जो सपना दिखाया गया था, वह अब सिर्फ नो सिग्नल और काली स्क्रीन के भरोसे चल रहा है।
हालत यह है कि स्टेडियम का फुटेज कार्यालय तक पहुंचते-पहुंचते रास्ते में ही दम तोड़ चुका है। ऐसा लगता है कि कैमरे खेलकूद देखकर इतने थक गए कि उन्होंने खुद ही आंखें मूंद लीं।
यही हाल शहर के व्यस्ततम बुधवारी बाजार का भी है। वहां लगे कैमरे अब सुरक्षा उपकरण कम और पक्षियों के बैठने का वीआईपी स्टैंड ज्यादा नजर आते हैं। बाजार की भीड़, जेबकतरे और अव्यवस्था सब अपनी जगह बेखौफ जारी हैं, क्योंकि कैमरे साहब ध्यान मुद्रा में लीन हैं।
पालिका के इस चमत्कारी प्रोजेक्ट से बस एक ही फायदा हुआ है—सरकारी बजट ठिकाने लग गया और फाइलों में शहर स्मार्ट और सुरक्षित दर्ज हो गया।




