कमरछठ (हलषष्ठी) पर्व : मातृ-आस्था, संतान की मंगलकामना और हमारी लोक-संस्कृति का पावन पर्व

बालोद -। छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोकपरंपराओं और सांस्कृतिक विरासत में कमरछठ अर्थात हलषष्ठी पर्व का विशेष महत्व है। यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि मां और संतान के बीच अटूट प्रेम, त्याग, आस्था और मंगलकामना का प्रतीक है। इस दिन माताएं अपनी संतानों, विशेषकर पुत्रों की दीर्घायु, सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और जीवन में आने वाली हर विपत्ति से रक्षा की कामना करते हुए श्रद्धापूर्वक व्रत धारण करती हैं।

मान्यता है कि इस पावन अवसर पर माताएं भगवान शिव एवं माता पार्वती सहित हलषष्ठी माता की आराधना कर अपनी संतान के उज्ज्वल भविष्य और दीर्घ जीवन के लिए प्रार्थना करती हैं। यह पर्व हमें यह संदेश भी देता है कि मां की ममता और संतान के प्रति उसकी मंगलकामना संसार की सबसे पवित्र भावनाओं में से एक है।
हलषष्ठी नाम का महत्व
हलषष्ठी पर्व भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। इसे छत्तीसगढ़ में आम बोलचाल की भाषा में कमरछठ कहा जाता है। इस पर्व का संबंध कृषि और ग्रामीण जीवन से भी गहराई से जुड़ा हुआ है। ‘हल’ अर्थात कृषि का प्रमुख साधन और ‘षष्ठी’ अर्थात छठी तिथि—इसी कारण इस पर्व को हलषष्ठी कहा जाता है।
इस दिन व्रती माताएं विशेष प्रकार के नियमों का पालन करती हैं और पसहर चावल सहित विभिन्न पारंपरिक सामग्रियों का उपयोग कर पूजा-अर्चना करती हैं। स्थानीय परंपराओं के अनुसार पसहर चावल को विशेष पवित्रता प्राप्त है और कमरछठ के व्रत में इसका विशेष महत्व माना जाता है।

पसहर चावल वितरण की 22 वर्षों की अनूठी परंपरा
बालोद नगर में जनसेवा और जनहित के कार्यों से निरंतर जुड़े वार्ड क्रमांक 02 के पार्षद कमलेश सोनी, नगर पालिका परिषद बालोद के उपाध्यक्ष, द्वारा पिछले 22 वर्षों से कमरछठ पर्व के अवसर पर माताओं को पसहर चावल का वितरण किया जाना एक उल्लेखनीय सामाजिक एवं धार्मिक सेवा परंपरा बन चुका है।
लगातार दो दशकों से अधिक समय से निभाई जा रही यह परंपरा केवल पसहर चावल बांटने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे मातृशक्ति के प्रति सम्मान, लोकपरंपरा के संरक्षण और समाज के प्रति सेवा भाव की भावना निहित है।
कमलेश सोनी द्वारा प्रत्येक वर्ष कमरछठ के अवसर पर पसहर चावल का वितरण करना बालोद नगर में इस पावन पर्व की आस्था को और अधिक व्यापक बनाने का माध्यम बना है। यह पहल इस बात का उदाहरण है कि हमारी लोक-संस्कृति और परंपराएं तभी जीवंत रहती हैं, जब समाज के लोग उन्हें श्रद्धा के साथ आगे बढ़ाते हैं।
मां की ममता और संतान की मंगलकामना
कमरछठ का सबसे भावपूर्ण पक्ष मां की वह भावना है, जिसमें वह अपनी संतान के सुख और सुरक्षा के लिए स्वयं कष्ट सहकर व्रत रखती है। मां की प्रार्थना में अपने लिए कुछ नहीं, बल्कि अपने बच्चों के लिए दीर्घायु, स्वस्थ जीवन, सुख-शांति, सफलता और हर संकट से रक्षा की कामना होती है।
यही कारण है कि कमरछठ केवल एक व्रत नहीं, बल्कि मातृत्व की शक्ति और त्याग का उत्सव है।

आज के आधुनिक दौर में भी छत्तीसगढ़ की माताएं इस परंपरा को पूरी श्रद्धा के साथ निभाती हैं। गांव से लेकर शहर तक कमरछठ के अवसर पर महिलाओं में विशेष उत्साह दिखाई देता है। पूजा-अर्चना, पारंपरिक रीति-रिवाज और सामूहिक सहभागिता इस पर्व को हमारी सामाजिक एकता और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ते हैं।
हमारी संस्कृति, हमारी पहचान
कमरछठ जैसे लोकपर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ते हैं। यह पर्व हमें हमारी मिट्टी, कृषि संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और लोकविश्वासों की याद दिलाता है। ऐसे पर्वों के माध्यम से नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और परंपराओं से परिचित कराने का अवसर भी मिलता है।

इसी भावना के साथ कमलेश सोनी….उपाध्यक्ष, नगर पालिका परिषद बालोद द्वारा 22 वर्षों से पसहर चावल वितरण की परंपरा निभाना सामाजिक सहभागिता और लोकसंस्कृति के संरक्षण की दिशा में एक सकारात्मक प्रयास माना जा सकता है।

कमरछठ का संदेश स्पष्ट है—
मां की प्रार्थना में संतान का सुख है, व्रत में त्याग है, परंपरा में हमारी संस्कृति है और सेवा में समाज की शक्ति है।
आइए, इस पावन अवसर पर हम सभी अपनी समृद्ध छत्तीसगढ़ी संस्कृति और परंपराओं का सम्मान करें तथा मातृशक्ति की श्रद्धा और आशीर्वाद को नमन करते हुए कमरछठ पर्व को प्रेम, आस्था और सामाजिक सद्भाव के साथ मनाएं…




