
सन्नाटे में 48 घंटे का डेडली गेम
घड़ी की टिक-टिक के साथ साजिश के मोहरे अपनी चालें चलने लगे। 27 मई को ऑर्डर जनरेट होता है। 28 मई को इनवॉइस कटती है।
और 29 मई की शाम होते-होते… बिना किसी डॉक्टर के, बिना किसी बायोमेडिकल इंजीनियर के और बिना किसी अस्पताल की मांग के, फाइलों पर कलम दौड़ती है और 2 लाख 40 हजार का भुगतान चुटकियों में पास हो जाता है।
इतनी तेज रफ्तार कि कोई सांस भी न ले पाए। लेकिन असली सस्पेंस अभी बाकी था। जब खुला रहस्यमयी पार्सल…
सवाल यह था कि क्या नगर पालिका किसी सीक्रेट हॉस्पिटल को चलाने जा रही थी? क्या ये मशीनें किसी गंभीर मरीज की नसों में खून दौड़ाने वाली थीं?
जवाब तब मिला जब उन बंद डिब्बों की सील टूटी। सामने जो मंजर था, उसने इस पूरी थ्रिलर फिल्म का क्लाइमेक्स बदल दिया।
To be continued..



