
सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे!
दफ्तर की दीवारों के भी कान होते हैं, और उन कानों से छनकर जो चर्चा बाहर आई है, वह बड़ी दिलचस्प है।
खबर आई कि जनहित, पारदर्शिता और दैनिक कार्यों को रॉकेट की रफ्तार देने के लिए साहब ने अधिकारियों और कर्मचारियों के बीच नवीन कार्य विभाजन कर दिया है।
पालिका के गलियारों में चर्चा जोरों पर है कि कार्य विभाजन का पूरा खेल AC दफ्तर वाले दरोगा जी की खातिर रचा गया है। व्यवस्था ऐसी चमत्कारी बनाई गई है कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे।
चर्चा है कि दरोगा जी का रुतबा और हुक्मरानों का आपसी प्रेम यूं ही 16 आने बरकरार रहे, इसके लिए राजस्व विभाग को सीधे-सीधे बलि का बकरा बना दिया गया।
कुर्सी की ठंडी हवा दरोगा जी की न छूटे, चाहे फील्ड का पसीना बहाने वाला राजस्व अमला कागजों और वसूली के बोझ तले दम ही क्यों न तोड़ दे।
सरजी, जब सेवा ही लक्ष्य है तो फिर शंका के बीज क्यों बोए जा रहे हैं? क्या जनता को यह जानने का भी हक नहीं कि उनकी गाढ़ी कमाई से चलने वाले दफ्तर में कौन सा मुलाजिम किस कुर्सी का भार बढ़ा रहा है?


